मन के हारे हार है Man ke Hare Haar Hai
मन क्योंकि सभी इच्छाओं का केंद्र है, सभी दृश्य-अदृश्य इंद्रियों का नियामक और स्वामी है। अत: व्यवहार के स्तर पर उसकी हार के वास्तविक हार और जीत को सच्ची जीत माना जाता है। इसलिए मन पर नियंत्रण और मन की दृढ़ता की बात भी बार-बार कही जाती है।
विद्वानों के अनुसार हर प्रकार की मानसिक दुर्बलता का उपचार यह है कि मनुष्य विपरीत दिशा में सोचना शुरू कर दे। जैसे ‘मेरा व्यक्तित्व पूर्ण है। उसमें त्रुटि या कमजोरी कोई है, तो मैं उसे दूर करके हूंगा। मैं अपने अंदर कोई कमी नहीं आने दूंगा। इस प्रकार निरंतर एंव बारंबार अपने मन में विचार दोहराते रहने से मनुष्य कर्म से अपने को सबल बनाता जाता है।’
प्रत्येक व्यक्ति को सोचना चाहिए कि वह ईश्वर की मौलिक रचना है ओर उसमें कुछ दिव्यता है। उस दिव्यता को व्यक्त करने का उसे दृढ़ करने की एक सफल क्रिया कह सकते हैं।
कई बार हमारे सामने ऐसा कठिन काम आ जाता है कि हम मन हारने लगते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि यह वस्तुत: हमारी परीक्षा का अवसर है। इंसानियत का इतिहास और प्रेरणा यही है कि वह हिम्मत न हारे। यह सोचकर उस कार्य को करने में तन-मन से डटे रहना चाहिए। देर-सबेर सफलता अवश्य मिलेगी।
निराशा की भावना मनुष्य के मन और तन दोनों को दुर्बल बनाती है। इसे पास नहीं आने देना चाहिए। हमें उनका अनुकरण करना चाहिए, जो बड़े से बड़े संकट में भी न घबरांए बल्कि डटकर कठिनाई का सामना करते हुए विजयी हुए। उनका अनुकरण मानसिक दृढ़ता और विजय की सीढ़ी बन सकता है।
मन ही बंधन का कारण बनता है, मन ही मोक्ष का। मन को ऊंचा रखने वाला अवश् विजयी होता है। अत: हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ हमें हार की ओर नहीं, हमेशा जीत की ओर ही बढऩा है औन मन को दृढ़-निश्चयी बनाकर बढ़ते जाना है। सफल-सार्थक जीवन व्यतीत कररने का अन्य कोई उपाय नहीं है।
मन क्योंकि सभी इच्छाओं का केंद्र है, सभी दृश्य-अदृश्य इंद्रियों का नियामक और स्वामी है। अत: व्यवहार के स्तर पर उसकी हार के वास्तविक हार और जीत को सच्ची जीत माना जाता है। इसलिए मन पर नियंत्रण और मन की दृढ़ता की बात भी बार-बार कही जाती है।
विद्वानों के अनुसार हर प्रकार की मानसिक दुर्बलता का उपचार यह है कि मनुष्य विपरीत दिशा में सोचना शुरू कर दे। जैसे ‘मेरा व्यक्तित्व पूर्ण है। उसमें त्रुटि या कमजोरी कोई है, तो मैं उसे दूर करके हूंगा। मैं अपने अंदर कोई कमी नहीं आने दूंगा। इस प्रकार निरंतर एंव बारंबार अपने मन में विचार दोहराते रहने से मनुष्य कर्म से अपने को सबल बनाता जाता है।’
प्रत्येक व्यक्ति को सोचना चाहिए कि वह ईश्वर की मौलिक रचना है ओर उसमें कुछ दिव्यता है। उस दिव्यता को व्यक्त करने का उसे दृढ़ करने की एक सफल क्रिया कह सकते हैं।
कई बार हमारे सामने ऐसा कठिन काम आ जाता है कि हम मन हारने लगते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि यह वस्तुत: हमारी परीक्षा का अवसर है। इंसानियत का इतिहास और प्रेरणा यही है कि वह हिम्मत न हारे। यह सोचकर उस कार्य को करने में तन-मन से डटे रहना चाहिए। देर-सबेर सफलता अवश्य मिलेगी।
निराशा की भावना मनुष्य के मन और तन दोनों को दुर्बल बनाती है। इसे पास नहीं आने देना चाहिए। हमें उनका अनुकरण करना चाहिए, जो बड़े से बड़े संकट में भी न घबरांए बल्कि डटकर कठिनाई का सामना करते हुए विजयी हुए। उनका अनुकरण मानसिक दृढ़ता और विजय की सीढ़ी बन सकता है।
मन ही बंधन का कारण बनता है, मन ही मोक्ष का। मन को ऊंचा रखने वाला अवश् विजयी होता है। अत: हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ हमें हार की ओर नहीं, हमेशा जीत की ओर ही बढऩा है औन मन को दृढ़-निश्चयी बनाकर बढ़ते जाना है। सफल-सार्थक जीवन व्यतीत कररने का अन्य कोई उपाय नहीं है।
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