भारतीय संस्कृति की विशेषतांए bhartiya sanskriti ki visheshtaaye 489 words
‘संस्कृतिै’ शब्द ‘संस्कार’ से बना माना गया है। इस कोई प्रत्यक्ष, मूर्त या साकार स्वरूप नहीं हुआ करता, वह तो मात्र एक अमूर्त भावना है। भावना भी सामान्य नहीं, बल्कि गुलाब की सी ही कोमल, सुंदर और सुंगधित भी। वह भावना जो अपने अमूर्त स्वरूप वाली डोर में न केवल केसी विशेष भू-भाग के निवासियों, बल्कि उससे भी आगे बढ़ सारी मानवता को बांधे रखने की अदभुत क्षमता अपने में सजोए रहती है। विश्व के और किसी भू-भाग (देश) की संस्कृति की यह सर्वाधिक प्रमुख एंव पहली विशेषता रेखांकित की जा सकती है। तभी तो जहां रोम-मिस्र जैसी सभ्यतांए और संस्कृतियां आज इतिहास या नुमाइश की वस्तु बनकर रह गई हैं, हमारी यानी भारतीय संस्कृति जिसे आर्य संस्कृति भी कहा जाता है। अपनी मूर्त-अमूर्त दोनों प्रकार की प्राणवत्ता में आज भी जीवित है।
हमारी इस प्राणवान संस्कृति की अनेक विशेषतांए रेखांकित की जाती हैं। उनमें से समन्वय-भाव या समन्वय-साधना भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता मानी गई है, यह बात ऊपर भी कही जा चुकी है। अनेकता में एकता बनाए रखने की दृष्टि इसी मूलभूत विशेषता की देन है। यहां प्रकृति ने ही भौगोलिक स्तर पर अनेकत्व का विधान कर रखा है। कहीं घने जंगल हैं तो कहीं ऊंचे बर्फीले पर्वतों की पंक्तियां, कहीं रेगिस्तान हैं तो कहीं दूर-दूर तक फैल रहे घने पठार। इनमें भिन्न वेशभूषा, खान-पान, रीति-रिवाज और भाषा-भाषी लोग निवास करते हैं। उनके धर्म, मत, पंथ, और संप्रदाय भी अलग-अलग है, फिर भी हम सब मलकर अपने आपको भारतीय कहने में ही गौरव का अनुभव करते हैं।
आदर्श घर-परिवार की कल्पना को भी हम केवल भारतीय संस्कृति की ही विशेषता और महत्वपूर्ण देन कह सकत ेहैं। परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी सदिच्छा के अनुसार चलने को स्वतंत्र है, फिर भी हम एक परिवार हैं। घर-परिवार का यही व्यवहार भारतीय जन को अन्य प्रांतों और पूरे राष्ट्र के साथ जोड़ता हुआ सामूहिक या समस्त मानवता की हित-साधना का संकल्प बनकर इस वेद-वाक्य में स्वत: ही प्रगट होने लगता है :
‘सर्वे भवंतु सुखिन : सर्वे संतु निरामय:।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद्दुख भाग भवेत।।’
इस प्रकार सहज मानवीय स्नेह-संबंधों की सारी मानवता को घेर लेना, उसके आद्यंत शुभ की कामना करना भारतीय संस्कृति की एक बहुत बड़ी उपलब्धि, विशेषता और विश्व-मानवता को अनोखी देन है। भारतीय संस्कृति इन तथ्यों के आलोक में जहां अद्वेैतवादी है, वहां वह जीवन जीने के लिए अनेकविध द्वेैतवादी सिद्धांतों पर भी विश्वास करने वाली है। ?
दया, क्षमा, शहनशीलता, निर्लोभ, उदारता, अहिंसा, असंचय, आदि विशेष बातों पर केवल भारतीय संस्कृति ही बल देती है, अन्य कोई नहीं। प्रमुखत: इन्हीं विशेषताओं के कारणों से भारत हर संकट से उबरता रहकर विश्व-रंगमंच पर आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। हमारी संस्कृति में वे सब अपने आरंभ काल से ही पाए जाते हैं। आज भी अपनी संपूर्ण ऊर्जा में ज्यों-के-त्यों बने हैं। यही हमारी शक्ति है, अस्तित्व और जीवंतता का प्रमाण है। इन समस्त आंतरिक और समन्वित ऊर्जाओं के कारण ही विश्वभर की संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति अजेय एंव अमर है।
‘संस्कृतिै’ शब्द ‘संस्कार’ से बना माना गया है। इस कोई प्रत्यक्ष, मूर्त या साकार स्वरूप नहीं हुआ करता, वह तो मात्र एक अमूर्त भावना है। भावना भी सामान्य नहीं, बल्कि गुलाब की सी ही कोमल, सुंदर और सुंगधित भी। वह भावना जो अपने अमूर्त स्वरूप वाली डोर में न केवल केसी विशेष भू-भाग के निवासियों, बल्कि उससे भी आगे बढ़ सारी मानवता को बांधे रखने की अदभुत क्षमता अपने में सजोए रहती है। विश्व के और किसी भू-भाग (देश) की संस्कृति की यह सर्वाधिक प्रमुख एंव पहली विशेषता रेखांकित की जा सकती है। तभी तो जहां रोम-मिस्र जैसी सभ्यतांए और संस्कृतियां आज इतिहास या नुमाइश की वस्तु बनकर रह गई हैं, हमारी यानी भारतीय संस्कृति जिसे आर्य संस्कृति भी कहा जाता है। अपनी मूर्त-अमूर्त दोनों प्रकार की प्राणवत्ता में आज भी जीवित है।
हमारी इस प्राणवान संस्कृति की अनेक विशेषतांए रेखांकित की जाती हैं। उनमें से समन्वय-भाव या समन्वय-साधना भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता मानी गई है, यह बात ऊपर भी कही जा चुकी है। अनेकता में एकता बनाए रखने की दृष्टि इसी मूलभूत विशेषता की देन है। यहां प्रकृति ने ही भौगोलिक स्तर पर अनेकत्व का विधान कर रखा है। कहीं घने जंगल हैं तो कहीं ऊंचे बर्फीले पर्वतों की पंक्तियां, कहीं रेगिस्तान हैं तो कहीं दूर-दूर तक फैल रहे घने पठार। इनमें भिन्न वेशभूषा, खान-पान, रीति-रिवाज और भाषा-भाषी लोग निवास करते हैं। उनके धर्म, मत, पंथ, और संप्रदाय भी अलग-अलग है, फिर भी हम सब मलकर अपने आपको भारतीय कहने में ही गौरव का अनुभव करते हैं।
आदर्श घर-परिवार की कल्पना को भी हम केवल भारतीय संस्कृति की ही विशेषता और महत्वपूर्ण देन कह सकत ेहैं। परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी सदिच्छा के अनुसार चलने को स्वतंत्र है, फिर भी हम एक परिवार हैं। घर-परिवार का यही व्यवहार भारतीय जन को अन्य प्रांतों और पूरे राष्ट्र के साथ जोड़ता हुआ सामूहिक या समस्त मानवता की हित-साधना का संकल्प बनकर इस वेद-वाक्य में स्वत: ही प्रगट होने लगता है :
‘सर्वे भवंतु सुखिन : सर्वे संतु निरामय:।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद्दुख भाग भवेत।।’
इस प्रकार सहज मानवीय स्नेह-संबंधों की सारी मानवता को घेर लेना, उसके आद्यंत शुभ की कामना करना भारतीय संस्कृति की एक बहुत बड़ी उपलब्धि, विशेषता और विश्व-मानवता को अनोखी देन है। भारतीय संस्कृति इन तथ्यों के आलोक में जहां अद्वेैतवादी है, वहां वह जीवन जीने के लिए अनेकविध द्वेैतवादी सिद्धांतों पर भी विश्वास करने वाली है। ?
दया, क्षमा, शहनशीलता, निर्लोभ, उदारता, अहिंसा, असंचय, आदि विशेष बातों पर केवल भारतीय संस्कृति ही बल देती है, अन्य कोई नहीं। प्रमुखत: इन्हीं विशेषताओं के कारणों से भारत हर संकट से उबरता रहकर विश्व-रंगमंच पर आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। हमारी संस्कृति में वे सब अपने आरंभ काल से ही पाए जाते हैं। आज भी अपनी संपूर्ण ऊर्जा में ज्यों-के-त्यों बने हैं। यही हमारी शक्ति है, अस्तित्व और जीवंतता का प्रमाण है। इन समस्त आंतरिक और समन्वित ऊर्जाओं के कारण ही विश्वभर की संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति अजेय एंव अमर है।
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