Searching...
Monday, July 1, 2019

साहित्य में प्रकृति-चित्रण sahitya mei prakriti chitran 500 words hindi essay

July 01, 2019
साहित्य में प्रकृति-चित्रण sahitya mei prakriti chitran 500 words hindi essay

प्रकृति अपने-आप में सुंदर है और मानव-स्वभाव से ही सौंदर्य-प्रेमी माना गया है। इसी कारण प्रकृति और मानव का संबंध उतना ही पुराना है, जितना कि इस सृष्टि के आरंभ का इतिहास। सांख्यदर्शन तो मानव-सृष्टि की उत्पति ही प्रकृति से मानता है। आधुनिक विकासवाद का सिद्धांत भी इसी मान्यता को बल देता है। अन्य दर्शन पृथ्वी, जल, वायु, अग्रि, और आकाश नामक जिन पांच तत्वों से सृष्टि की उत्पति और विकास मानते हैं, वे भी तो अपने मूल स्वरूप में वस्तुत: प्रकृति के ही अंग है। यह सब कहने का अभिप्राय केवल यह दर्शाना है कि मानव और प्रकृति का संबंध अनादि और चिरंतन है। इसी कारण मानव-जीवन की महानतम उपलब्धि साहित्य और प्रकृति का संबंध भी उतना ही अनादि, चिरंतन और शाश्वत है जितना कि मानव और प्रकृति का।

सभी जानते हैं कि प्रकृति के कोमल-कांत और भयानक मुख्यत: दो ही स्वरूप हैं। ये दोनों स्वरूप प्रत्येक मानव और विशेषकर कवि और साहित्यकार कोटि के मानव को आरंभ से ही भावना का सबल प्रदान करते आ रहे हैं। तभी ताक कवि ने वैदिक साहित्य में यदि प्रकृति को दैवी स्वरूपों में देखा और प्रतिष्ठित किया है, तो परवर्ती कवियों ने उसे उपदेशिका, पथप्रदर्शिका, प्रेमिका, मां, सुंदरी-अप्सरा आदि जाने कितने-कितने रूपों में देखा और चितारा है।

हर युग के कवि और साहित्कार ने किसी-न-किसी रूप में प्रकृति का दाम अवश्य ही थामा है। वैदिक साहित्य प्रकृति-चित्रण संबंधी ऋचाओं और सूक्तों से भरा पड़ा है। परवर्ती लौकिक संस्कृत काल का साहित्य भी इसका अपवाद नहीं। कालिदास का ‘मेघदूत’ प्रकति-चित्रण से संबंधित एक अजोड़ काव्य कहा जा सकता है। बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ से विशाल, विराट और उदात्त प्रकृति-चित्रण को भला कौन भुला सकता है? संस्कृत में ऐसा एक भी कवि एंव साहित्यकार नहीं हुआ, जिसका मन-मस्तिष्क प्रकृति के रूपचित्रों के चित्रण में न रमा हो। पालि और प्राकृतों के काल में भी मुक्त रूप से प्रकृति-चित्रण साहित्य का अंगभूत रहा।  तब के कवियों के लिए प्रकृति के मुक्त निरीक्षण-वर्णन के लिए उपयुक्त अवसर ही नहीं रह गया था। यही बात भक्ति और रीतिकाल के बारे में भी एक सीमा तक सत्य कही जा सकती है। फिर भी प्रकृति ने मानव और साहित्य का साथ कभी छोड़ा नहीं, यह निभ्र्रान्त सत्य है।

परवर्ती भक्तिकाल के साहित्य में जायसी और तुलसीदास के काव्यों में प्रकृति के प्राय: सभी रूपों के उन्मुक्त दर्शन होने लगते हैं। वहां प्रकृति मानव के सुख-दुख की सहभागिनी भी बनती हुई दिखाई देती है। तभी तो जायसी की रानी नागमती की विरह-दशा सी पीडि़त होकर- ‘आधी रात पपीहा बोला’ और सीता-हरण के बाद श्रीराम के मुख से इस प्रकार के उक्तियां सुनने को मिलती हैं :

‘हे खग-मृग है मधुकर स्नेनी। तुम देखी सीता मृगनैनी।’

इतना ही नहीं, उमड़ घुमडक़र आते बादलों को देख श्रीराम लक्ष्मण से कह उठते हैं:

‘घन घमंड गरजत नभ घोरा। प्रियाहीन मन डरपत मोरा।’


राष्ट्रीयता की भावना ही किसी एक भू-भाग के निवासियों को परस्पर संबद्ध रखा करती है, यह बात स्पष्ट है। मातृभूमि पर मिटने की प्रेरणा दिया करती है। हिंदी साहित्य के आदिकाल के कवि इस बात को भली प्रकार समझते थे, इसी कारण संकुचित स्तर पर ही सही, वे लोग अपने आश्रयदाताओं की राष्ट्रीय भावनाओं की हमेशा उद्दीप्त रखते रहे। उसी युग के आल्हाकार ने ही तो राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावना से अनुप्राणित हो यह कहा था :

‘बारह बरसि लै कूकर जीयें, और तेरह लै जियें सियार।

0 comments:

Post a Comment

:) :)) ;(( :-) =)) ;( ;-( :d :-d @-) :p :o :>) (o) [-( :-? (p) :-s (m) 8-) :-t :-b b-( :-# =p~ $-) (b) (f) x-) (k) (h) (c) cheer
Click to see the code!
To insert emoticon you must added at least one space before the code.