सैनिक-शिक्षा और विद्यार्थी
Compulsory Military Education
जीवन में सफलता पाने के लिए हर प्रकार की शिक्षा अनिवार्य है। ‘शिक्षा’ शब्द का व्यापक अर्थ केवल कुछ किताबें पढक़र, एक के बाद एक परीक्षांए पास करते जाना ही नहीं है, बल्कि वास्तविक अर्थ है जहां से जो कुछ भी अच्छा और उपयोगी मिल सके, वह सब कुछ सीखना और अपना लेना। इस ्रव्यापक अर्थ और संदर्भ में ही ‘सैनिक-शिक्षा और विद्यार्थी’ जैसे विषय पर विचार करना युक्तिसंगत और उपयोगी हो सकता है। यहां भी इसी अर्थ में विचार किया जा रहा है।
आज का विद्यार्थी भविष्य का सामान्य और विशेष सभी प्रकार का नागरिक, नेता, प्रशासक आदि सभी कुछ हुआ करता है। अत: शिक्षा-काल में हर दृष्टि से और सभी स्तरों पर उसे अपने एंव राष्ट्र के भविष्य की रक्षा की तैयारी करनी पड़ती है। इसी स्थिति में या इस दृष्अि से जब हम विद्यार्थियों के लिए एक प्रकार से अनिवार्य सैनिक-शिक्षा की चर्चा करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि उसे यह शिक्षा किसी पर आक्रमण करने या देशकी सीमाओं का विस्तार करने के लिए लेनी चाहि, बल्कि इसका सीध अर्थ है अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता और सीमाओं की रखा के लिए उसे सैनिक-शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। इसके अन्य कई प्रयोजन एंव उपयोग भी हो सकते हैं। सैनिक का जीवन तो कठिन होता ही है, उसे दी जाने वाली शिक्षा भी सरल न होकर अत्यंत कठिन हुआ करती है। अत: सैनिक-शिक्षा-प्राप्त विद्यार्थी वर्तमान और भविष्य में प्रत्येक कठिन परिस्थिति और वातावरण में रहना सीखने के साथ-साथ जीना और कठिनाइयों का सरलता से सामना करना भी सीख लेता है। इस सीख के बाद वह सब प्रकार से समर्थ हो सकता है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि सैनिक का जीवन एक विशेश प्रकार के अनुशासन में पलता और अनुशासित ढांचे में ढला स्वस्थ-सुंदर हुआ करता है। यदि विद्यार्थियों के लिए सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी जाए, तो निश्चय ही इस प्रकार के बहुत सारे सुपरिणाम हमारे सामने आ सकते हैं। अनुशासहीनता की व्यापक समस्या का समाधान तो हो ही सकता है, हमारी भविष्य के लिए उभर रही वर्तमान पीढ़ी सभी प्रकार से स्वस्थ एंव सुंदर भी हो सकती है। इस प्रकार के और भी कईं ऐसे संदर्भ है जो सैनिक-शिक्षा के महत्व को उजागर करते हैं।
इस प्रकार की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सैनिक-शिक्षा देते समय तत्काल उचित निर्णय कर पाने की क्षमता का भी स्वाभाविक विकास किया जाता है। विद्यार्थी इस प्रकार की क्षमता प्राप्त कर बड़े होन ेपर अपने और पूरे देश-समाज के लिए निर्णायक क्षणों में उचित नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं। इन सूक्ष्म बातों के अतिरिक्त आज के संदर्भों में विद्यार्थियों और नवयुवकों को अनिवार्य सैनिक-शिक्षा देना अन्य कई दृष्टियों से भी आवश्यक एंव लाभप्रद स्वीकारा जाता है। भारत जैसे चारों ओर से विरोधी विचारधाराओं और शक्तियों से घिरे देश के लिए तो उन स्थूल बातों के संदर्भ में अनिवार्य सैनिक शिक्षा का महत्व निश्चय ही और भी बढ़ जाता है। विदेशी आक्रमण ओर संकट काल में नियमित सैनिम तो अग्रिम मोर्चो संभाले हुआ करते हैं, तब सैनिक-रूप में शिक्षित विद्यार्थी और युवा वर्ग देश की भीतरी स्थितियों को संभाल, दूसरी रक्षा-पंक्ति का काम कर सभी का मनोबल बढ़ांए एंव आस्था जगाए रख सकते हैं। भारत क्योंकि अपनी स्वतंत्रता के विगत पचास वर्षों में पड़ोसी देश के अकारण आक्रमणों का तीन-चार बार शिकार हो चुका है, अत: यहां की युवा शक्ति का हमेशा सैनिक रूप में सन्नद्ध रहना निश्चय ही आवश्यक है। उस स्थिति में तो और भी कि जब हमारी सार्वभौम राष्ट्रीय सत्ता को चुनौतियां मिलती रहती हों और अकारण आक्रमणों का भय निरंतर बना हुआ हो।
यदि विद्यार्थी और युवा वर्ग सैनिक रूप में प्रशिक्षित रहता है, तो सामान्य शांति काल में भी वह देश-हित में बहुत कुछ कर सकता है। वह राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में सहायता पहुंचा सकता है, प्राकृतिक विपदाओं के समय देश के धन-जन की रक्षा कर सकता है। इस सबसे भी बढक़र वह देशवासियों को संगठित रख उनका मनोबल बनाए-बढृाए रख सकता है। राष्ट्र को दृढ़ आस्था और विश्वास दे सकता है। अनिवार्य सैनिक-शिक्षा के एक खतरे की ओर भी ध्यान आकर्षित किया जाता है। वह यह कि इस प्रकार धीरे-धीरे सारा देश ही सैनिक मनोवृति एंव सैनिक छावनी में बदल जाएगा। जिस हिंसा वृति का प्रयोग सैनिक के लिए शत्रु के प्रति आवश्यक हुआ करता है, वह अन्यत्र भी प्रगट होने लगेगी इत्यादि।
पर हमारे विचार में इस प्रकार के खतरे उस सैनिकवेश में हुआ करते हैं जो अनुशासित नहीं हुआ करता, या फिर जिसे अन्य कोई काम-धाम न हो और केवल बेकारी ही हो। नहीं, विद्यार्थियों और युवाओं को सैनिक-शिक्षा देने का यह अर्थ नहीं कि उनके सजह-स्वाभाविक जीवनक्रम को ीाी सैनिकत्व में ढाल दिया जाए। प्रयोजन केवल इतना और इस प्रकार की शिक्षा देना है, जो अनुशासन के साथ-साथ प्रतिरक्षा में भी सक्षम बना सके। ऐसी शिक्षा की व्यवस्था अवश्य ही व्यापक स्तर पर की जानी चाहिए। आज के संदर्भों में इसका महत्व और आवश्यकता बताने समझाने की जरूरत नहीं। सभी जानते और मानते हैं।
Compulsory Military Education
जीवन में सफलता पाने के लिए हर प्रकार की शिक्षा अनिवार्य है। ‘शिक्षा’ शब्द का व्यापक अर्थ केवल कुछ किताबें पढक़र, एक के बाद एक परीक्षांए पास करते जाना ही नहीं है, बल्कि वास्तविक अर्थ है जहां से जो कुछ भी अच्छा और उपयोगी मिल सके, वह सब कुछ सीखना और अपना लेना। इस ्रव्यापक अर्थ और संदर्भ में ही ‘सैनिक-शिक्षा और विद्यार्थी’ जैसे विषय पर विचार करना युक्तिसंगत और उपयोगी हो सकता है। यहां भी इसी अर्थ में विचार किया जा रहा है।
आज का विद्यार्थी भविष्य का सामान्य और विशेष सभी प्रकार का नागरिक, नेता, प्रशासक आदि सभी कुछ हुआ करता है। अत: शिक्षा-काल में हर दृष्टि से और सभी स्तरों पर उसे अपने एंव राष्ट्र के भविष्य की रक्षा की तैयारी करनी पड़ती है। इसी स्थिति में या इस दृष्अि से जब हम विद्यार्थियों के लिए एक प्रकार से अनिवार्य सैनिक-शिक्षा की चर्चा करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि उसे यह शिक्षा किसी पर आक्रमण करने या देशकी सीमाओं का विस्तार करने के लिए लेनी चाहि, बल्कि इसका सीध अर्थ है अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता और सीमाओं की रखा के लिए उसे सैनिक-शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। इसके अन्य कई प्रयोजन एंव उपयोग भी हो सकते हैं। सैनिक का जीवन तो कठिन होता ही है, उसे दी जाने वाली शिक्षा भी सरल न होकर अत्यंत कठिन हुआ करती है। अत: सैनिक-शिक्षा-प्राप्त विद्यार्थी वर्तमान और भविष्य में प्रत्येक कठिन परिस्थिति और वातावरण में रहना सीखने के साथ-साथ जीना और कठिनाइयों का सरलता से सामना करना भी सीख लेता है। इस सीख के बाद वह सब प्रकार से समर्थ हो सकता है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि सैनिक का जीवन एक विशेश प्रकार के अनुशासन में पलता और अनुशासित ढांचे में ढला स्वस्थ-सुंदर हुआ करता है। यदि विद्यार्थियों के लिए सैनिक शिक्षा अनिवार्य कर दी जाए, तो निश्चय ही इस प्रकार के बहुत सारे सुपरिणाम हमारे सामने आ सकते हैं। अनुशासहीनता की व्यापक समस्या का समाधान तो हो ही सकता है, हमारी भविष्य के लिए उभर रही वर्तमान पीढ़ी सभी प्रकार से स्वस्थ एंव सुंदर भी हो सकती है। इस प्रकार के और भी कईं ऐसे संदर्भ है जो सैनिक-शिक्षा के महत्व को उजागर करते हैं।
इस प्रकार की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सैनिक-शिक्षा देते समय तत्काल उचित निर्णय कर पाने की क्षमता का भी स्वाभाविक विकास किया जाता है। विद्यार्थी इस प्रकार की क्षमता प्राप्त कर बड़े होन ेपर अपने और पूरे देश-समाज के लिए निर्णायक क्षणों में उचित नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं। इन सूक्ष्म बातों के अतिरिक्त आज के संदर्भों में विद्यार्थियों और नवयुवकों को अनिवार्य सैनिक-शिक्षा देना अन्य कई दृष्टियों से भी आवश्यक एंव लाभप्रद स्वीकारा जाता है। भारत जैसे चारों ओर से विरोधी विचारधाराओं और शक्तियों से घिरे देश के लिए तो उन स्थूल बातों के संदर्भ में अनिवार्य सैनिक शिक्षा का महत्व निश्चय ही और भी बढ़ जाता है। विदेशी आक्रमण ओर संकट काल में नियमित सैनिम तो अग्रिम मोर्चो संभाले हुआ करते हैं, तब सैनिक-रूप में शिक्षित विद्यार्थी और युवा वर्ग देश की भीतरी स्थितियों को संभाल, दूसरी रक्षा-पंक्ति का काम कर सभी का मनोबल बढ़ांए एंव आस्था जगाए रख सकते हैं। भारत क्योंकि अपनी स्वतंत्रता के विगत पचास वर्षों में पड़ोसी देश के अकारण आक्रमणों का तीन-चार बार शिकार हो चुका है, अत: यहां की युवा शक्ति का हमेशा सैनिक रूप में सन्नद्ध रहना निश्चय ही आवश्यक है। उस स्थिति में तो और भी कि जब हमारी सार्वभौम राष्ट्रीय सत्ता को चुनौतियां मिलती रहती हों और अकारण आक्रमणों का भय निरंतर बना हुआ हो।
यदि विद्यार्थी और युवा वर्ग सैनिक रूप में प्रशिक्षित रहता है, तो सामान्य शांति काल में भी वह देश-हित में बहुत कुछ कर सकता है। वह राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में सहायता पहुंचा सकता है, प्राकृतिक विपदाओं के समय देश के धन-जन की रक्षा कर सकता है। इस सबसे भी बढक़र वह देशवासियों को संगठित रख उनका मनोबल बनाए-बढृाए रख सकता है। राष्ट्र को दृढ़ आस्था और विश्वास दे सकता है। अनिवार्य सैनिक-शिक्षा के एक खतरे की ओर भी ध्यान आकर्षित किया जाता है। वह यह कि इस प्रकार धीरे-धीरे सारा देश ही सैनिक मनोवृति एंव सैनिक छावनी में बदल जाएगा। जिस हिंसा वृति का प्रयोग सैनिक के लिए शत्रु के प्रति आवश्यक हुआ करता है, वह अन्यत्र भी प्रगट होने लगेगी इत्यादि।
पर हमारे विचार में इस प्रकार के खतरे उस सैनिकवेश में हुआ करते हैं जो अनुशासित नहीं हुआ करता, या फिर जिसे अन्य कोई काम-धाम न हो और केवल बेकारी ही हो। नहीं, विद्यार्थियों और युवाओं को सैनिक-शिक्षा देने का यह अर्थ नहीं कि उनके सजह-स्वाभाविक जीवनक्रम को ीाी सैनिकत्व में ढाल दिया जाए। प्रयोजन केवल इतना और इस प्रकार की शिक्षा देना है, जो अनुशासन के साथ-साथ प्रतिरक्षा में भी सक्षम बना सके। ऐसी शिक्षा की व्यवस्था अवश्य ही व्यापक स्तर पर की जानी चाहिए। आज के संदर्भों में इसका महत्व और आवश्यकता बताने समझाने की जरूरत नहीं। सभी जानते और मानते हैं।
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