महंगाईः एक समस्या
महंगाई आज हर किसी के मुख पर चर्चा का विषय बन चुका है। विश्व का हर देश इस से ग्रसित होता जा रहा है। परन्तु भारत जैसे विकासशील राष्ट्रों के लिए बढ़ती हुई महंगाई गंभीर चिंता का विषय है। एक और जहा लोगो की औसतन आय पहले ही कम है उसपर दिन बाद दिन बढ़ती हुई महंगाई की मार से लोगो का जीना दूभर होता जा रहा है।
महंगाई ने आम जनता का जीवन अत्यन्त दुष्कर कर दिया है। पेट्रोल डीज़ल के ही बढ़ोतरी देखने को मिल जा रही है। यदि पुरे महीने के हिसाब से देखा जाए तो पेट्रोल डीज़ल हर महीने लगभग 5 रुपये से 8 रुपये तक बढ़ जाता है। यह तो रही बात के आम आदमी पर प्रत्यक्ष रूप से हर महीने आम आदमी की जेब की कटौती की लेकिन अप्रत्याख रूप से पेट्रोल डीज़ल की कीमत से हर रोज मर्रा की जरुरत की चीज भी महंगी हो जाती है क्युकी वास्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने का खर्च बढ़ जाता है।
आज दैनिक उपभोग की वस्तुएं हों अथवा रिहायशी वस्तुएँ , हर वस्तु की कीमत दिन-व-दिन बढ़ती और पहुँच से दूर होती जा रही है। महंगाई के कारण हम अपने दैनिक उपभोग की वस्तुओं में कटौती करने को विवश होते जा रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक जहाँ साग-सब्जियाँ कुछ रूपयों में हो जाती थीं, आज उसके लिए लोगों को सैकड़ों रूपये चुकाने पड़ रहे हैं।
वेतनभोगियों के लिए तो यह अभिशाप की तरह है।ऐसा नहीं के वेतन में बढ़ोतरी नहीं होती। परन्तु वेतन में बढ़ोतरी से कही जयादा बढ़ोतरी आम जरुरत की समाग्री में हो जाती है। महंगाई की तुलना में वेतन नहीं बढ़ने से वेतन और खर्च में सामंजस्य स्थापित नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सरकार को हस्तक्षेप करके कीमतों पर नियंत्रण रखने के दूरगामी उपाय करना चाहिए। सरकार को महंगाई के उन्मूलन हेतु गहन अध्ययन करना चाहिए और ऐसे उपाय करना चाहिए ताकि महंगाई डायन किसी को न सताए।
महंगाई के लिए तेजी से बढ़ती जनसंख्या, सरकार द्वारा लगाए जाने वाले अनावश्यक कर तथा माँग ग की तुलना में आपूर्ति की कमी है। बेहतर बाजार व्यवस्था से कुछ हद तक मुक्ति मिलेगी। पेट्रोलियम उत्पाद, माल भाड़ा, बिजली आदि जैसी मूलभूत विषयों पर जब-तब बढ़ोतरी नहीं करना चाहिए। इन में वृद्धि का विपरित प्रभाव हर वस्तु के मूल्य पर पड़ता है। सरकार की चपलता और आम जनता का सहयोग मिलकर ही महंगाई को नियंत्रित कर सकती है।
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